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दुर्गा पूजा: आस्था, संस्कृति और नारी शक्ति का महापर्व

परिचय:
भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर उत्सव में संस्कृति, परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इन्हीं त्योहारों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भव्य त्योहार है — दुर्गा पूजा। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक धरोहर और कलात्मक अभिव्यक्ति का भी महोत्सव है।

दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा का महत्व:
दुर्गा पूजा माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का पर्व है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माँ दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध कर संसार को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया था। दुर्गा पूजा इसी विजय गाथा का उत्सव है, जिसमें श्रद्धालु माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा कर शक्ति, ज्ञान, और भक्ति का आह्वान करते हैं।

दुर्गा पूजा का समय और अवधि:
दुर्गा पूजा का आयोजन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होता है और विजयदशमी तक चलता है। विशेष रूप से सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी के दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड और असम सहित देश के कई हिस्सों में इसे अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है।

पूजा विधि और परंपराएँ:

 दुर्गा पूजा की शुरुआत घट स्थापना (कलश स्थापना) से होती है। इसके बाद माँ दुर्गा की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। विभिन्न अनुष्ठान जैसे पुष्पांजलि, संधि पूजा, कुमारी पूजा आदि विधिपूर्वक संपन्न किए जाते हैं। भक्तजन व्रत रखते हैं, विशेष भोग बनाते हैं और माँ दुर्गा की आरती व भजन-कीर्तन करते हैं।

पंडालों की भव्यता:

 दुर्गा पूजा के समय पूरे देश में भव्य पंडालों का निर्माण होता है। इन पंडालों को अद्भुत कलाकृतियों, थीम आधारित सजावट और रोशनी से सजाया जाता है। कलाकार महीनों पहले से मूर्तियों और सजावट की तैयारियों में जुट जाते हैं। हर पंडाल अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करता है, जिससे एक अद्भुत प्रतिस्पर्धा और रचनात्मकता का माहौल बनता है।

सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेलों का आयोजन:

 दुर्गा पूजा केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है। नाटक, नृत्य, संगीत, कविता पाठ, प्रतियोगिताएँ और मेलों का आयोजन होता है, जो सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए आनंद का स्रोत बनते हैं। विशेष कर बंगाल में ‘धूनुची नृत्य’ बहुत प्रसिद्ध है, जिसमें भक्तगण धूप जलाते हुए माँ दुर्गा के समक्ष नृत्य करते हैं।

विजयदशमी और प्रतिमा विसर्जन:

दुर्गा पूजा का अंतिम दिन विजयदशमी कहलाता है। इस दिन माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का जल में विसर्जन किया जाता है। यह क्षण भक्तों के लिए भावुक होता है क्योंकि वे माँ को अगले वर्ष फिर से आने का आमंत्रण देते हैं। विजयदशमी का दिन राम के रावण पर विजय का भी प्रतीक है, इसीलिए कई स्थानों पर रावण दहन भी किया जाता है।

दुर्गा पूजा का सामाजिक महत्व:

दुर्गा पूजा समाज में एकता, भाईचारे और सहयोग की भावना को बढ़ावा देती है। इस आयोजन में सभी धर्म, जाति और वर्ग के लोग सम्मिलित होते हैं। यह पर्व सामूहिकता और सह-अस्तित्व का जीता-जागता उदाहरण है। साथ ही, इस समय बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होते हैं — मूर्तिकार, दर्जी, सजावट करने वाले, खाने-पीने के स्टॉल लगाने वाले आदि के लिए यह व्यस्ततम समय होता है।

नारी शक्ति का प्रतीक:

माँ दुर्गा स्वयं नारी शक्ति की प्रतीक हैं। दुर्गा पूजा के माध्यम से हम नारी शक्ति का सम्मान करना और समाज में महिलाओं की भूमिका को स्वीकार करना सीखते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि जब अन्याय और अधर्म अपनी सीमाएँ लांघने लगे, तब शक्ति स्वरूपा नारी भी परिवर्तन की अग्रदूत बन सकती है।


निष्कर्ष:

दुर्गा पूजा मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, कला, सामाजिक एकता और नारी शक्ति का महोत्सव है। हर वर्ष जब माँ दुर्गा अपने बच्चों के बीच आती हैं, तो वह केवल बुराइयों का नाश नहीं करतीं, बल्कि हमारे भीतर नई ऊर्जा, आशा और उमंग का संचार भी करती हैं। आइए, इस दुर्गा पूजा पर हम भी माँ दुर्गा से शक्ति, साहस और करुणा का आशीर्वाद माँगें और अपने जीवन में अच्छाई और प्रेम का संचार करें।

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